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युग कुलपति कीर्ति करलव





आदरणीय !
भारत में गुरुकुल की परम्परा अति प्राचीन है।
भारतीय आदर्श चाहे श्रीराम हों या श्रीकृष्ण अथवा आदि शंकराचार्य, भारत देश की लगभग सभी विभूतियों ने गुरुकुल में निवास करते हुए ही विद्याध्ययन किया और अपनी मनीषा से अशेष विश्व को चमत्कृत किया है।

भारतीय गुरुकुल नैतिकता के उन उच्च मानदण्ड पर संचालित थे जिनमें शिक्षा को व्यवसाय नहीं अपितु जन-जन की आवश्यकता समझा जाता था। अमीर हो या गरीब, सब एक परिस्थिति में गुरुकुल में अध्ययन करते थे। बच्चे को शिक्षा ही निःशुल्क नहीं अपितु गुरुकुल में रहने की अवधि तक भोजन, वस्त्र, आवास और चिकित्सादि भी निःशुल्क ही प्राप्त होते थे।
एक साथ दस हजार विद्यार्थियों का भरण-पोषण करते हुये पढाने वाले को ‘कुलपति’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता था। यथा-
मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नपानादिपोषणात्।अध्यापयति विप्रर्षिः स वै कुलपतिः स्मृतः। यहाँ प्रयुक्त ‘स्मृतः’ शब्द इस परम्परा की पुरातनता का प्रमाण है।
यह प्राचीन शिक्षा पद्धति का वैशिष्ट्य ही है कि उसे समाप्त करने वाले भी उसी के स्थापित शब्दों से अपनी पहचान बनाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। तभी तो भारी ‘फीस और डोनेशन’ लेकर चलाये जा रहे संस्थानों के मुखिया भी संकोच छोड़कर स्वयं को ‘कुलपति’ कहला रहे हैं। जो कि ‘वाइस चांसलर’ का ‘ वाइफ का पत्नी’ जैसा अनुवाद है जो सामान्यतः कर दिया जाता है लेकिन यदि अर्थ पर विचार करें तो दोनों में अपनी-अपनी परम्परा का भेद विद्यमान है।



यह प्राचीन शिक्षा पद्धति का वैशिष्ट्य ही है कि उसे समाप्त करने वाले भी उसी के स्थापित शब्दों से अपनी पहचान बनाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। तभी तो भारी ‘फीस और डोनेशन’ लेकर चलाये जा रहे संस्थानों के मुखिया भी संकोच छोड़कर स्वयं को ‘कुलपति’ कहला रहे हैं। जो कि ‘वाइस चांसलर’ का ‘ वाइफ का पत्नी’ जैसा अनुवाद है जो सामान्यतः कर दिया जाता है लेकिन यदि अर्थ पर विचार करें तो दोनों में अपनी-अपनी परम्परा का भेद विद्यमान है।
भारत में वशिष्ठ, कण्व, भरद्वाज, सान्दीपनि आदि अनेक स्वनामधन्य कुलपति हो गये हैं जो दस हजार बच्चों को बिना किसी शुल्क के भरण-पोषण सहित शिक्षा प्रदान करते थे।
वर्तमान में पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज वैसे कुलपति हो रहे हैं जिन्होंने आस्तिक जनता के सहयोग से प्राचीन वास्तविक कुलपति-परम्परा को पुनरुज्जीवित करने का बीडा उठाया है।
इसीलिये हम दस हजार विद्यार्थियों के साथ उनको ‘युग-कुलपति’ कहकर उनकी कीर्ति का कलरव करने और उनका दिव्य सम्बोधन सुनने के लिये एक त्रिदिवसीय अपूर्व समज्या में समवेत हो रहे हैं। इसी महामहोद्धव में संकल्पित ‘महागुरुकुल’ की रूपरेखा उद्घोषित होगी।
निश्चित मानिये, पूज्यपाद ‘युग-कुलपति’ का यह ‘महागुरुकुल’ न केवल भारत के प्राचीन गौरव को वापस लायेगा अपितु भारत को सच्चे अर्थों में भारत भी बनायेगा।
उनके इस संकल्प को मूर्तिमान् होता देखने तथा अपना ‘गिलहरी योगदान’ देने के लिये आपश्री सेष्टमित्र सादर आमन्त्रित हैं।

स्वामिश्रीः 1008 अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती